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गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

ये आंधी आज मुझे कहीं दूर ले जाने वाली है ..

शाम का धुंधलका है और रात गहराने वाली है,
मेरी तन्हाई मुझे फिर से बुलाने वाली है...
आज मैं हूँ, मेरे होने का तू यकीन तो कर,
कल शायद मौत मुझे पास बिठाने वाली है...
बारहा जिन्हें याद कर नम कर लेते हैं ये आँखें
वो ख्वाब की दुनिया मुझे यूँ भी बहलाने वाली है...
ज़ख्मो को कुरेंदने की जरूरत नहीं मेरे हमसफ़र
तेरी बेवफाई ही मेरे ये ज़ख्म सहलाने वाली है...
आज इक बार आ भी जाओ उठाने को शायद मुझे,
कल को फिर ये तकदीर मुझको गिराने वाली है....
सोया नहीं यूँ भी कई रातों से मैं,
सोया नहीं यूँ भी कई रातों से मैं,
दहशत उस जुदाई की मुझे फिर से जगाने वाली है...
तुम लाख कर लो कोशिश मुझे हंसाने की,
मेरी दुनिया तो यूँ भी मुझे रुलाने वाली है....
किसी और ही राही की तकदीर में लिखी होगी मंजिल,
मेरी तकदीर तो मुझे यूँ भी भटकाने वाली है..
शौक नहीं मुझे के मैं खुद को परदे को ओट में रखूं,
ये आंधी आज मुझे कहीं दूर ले जाने वाली है ..
प्यास बुझाने के लिए हर किसी को इक कुआँ तो मिला,
ये मरीचिका सहराओं की मुझे प्यासा ही मिटाने वाली है...

~बलदेव~

गुरुवार, नवंबर 24, 2011

Let it be 'now' or 'never'.

You could see the one,
You could search the one,
You could admire the one,
You could wait for the one,
You could smile with the one,
You could mingle with the one,
You could shout on that one,
You could cry for that one,
You could trust the one,
You could text the one,
but....
You could never express on that one... amazing... unbelievable... but true.. Life and time not waiting for long as we all are running on a fixed track having a dead end.. 



Let it be 'now' or 'never'.

शनिवार, नवंबर 05, 2011

I AM A LADY LOOKING FOR LOVE

(Baldev's feelings for an isolated mother)


I enjoyed my childhood
as a kid,
and tried all the 
hooks and crooks
to force my parents
to make me happy.....
I enjoyed my adulthood
as a girl,
and tried all the
fun and joy
to make others happy.....
I enjoyed my marriage
as a bride,
and tried all the
respect and regard
to give my best
to make in-laws happy....
I enjoyed my marriage
as a housewife,
and tried all the
love and sex
to make my husband happy...
I enjoyed my motherhood
as a mom,
and tried all the
love and care
to make my kids happy....
Now, I am old...
sick and cold,
and trying all the
options

with all reasons
to make myself happy....
but where the happiness gone..
I am living isolated and alone,
crying without kids,
husband n in-laws.....
All are happy to make me unhappy...
I am still a mother of my kids...
I am still a wife of a loving husband...
I am still 'me' with(out) all........ :-(((

गुरुवार, नवंबर 03, 2011

तुम्हारी हंसी मेरी दुनिया को तो ना बदल पायेगी.. जब भी आयेंगे आंसू, मुझे तेरी याद जरूर आएगी..

1. ये महज़ इत्तेफाक की बात है, कोई मजबूरी तो नहीं...
जो ना आयें ख्वाबों में उन्हें याद करना जरूरी तो नहीं...
काम आये वक़्त पे ऐसा हमसफ़र कोई मिल जायेगा,
जब कभी आंसू निकले उसका कंधा नज़र आएगा...
बुलाता हो अक्सर, जब रात का गहराता हुआ सन्नाटा..
"बलदेव" तेरे शीशे में उसका ही अक्स नज़र आएगा....

2. तेरी आरज़ू का इक तोहफा जो हमें वक़्त ने थमा दिया,
अब कैसे वक़्त और जिंदगी से शिकवा करेंगे हम..

3. वक़्त ने ही अक्सर हमको रुलाया है,
ग़मों का वैसे भी हमपे साया है..
तेरी चाहत न होती तो फिर भी जी लेता मैं, 
तेरे होने के दर्द ने ही मुझे तद्पाया है.....

4. खुशनसीब हैं वो जिन्हें तुम याद करते हो..
ख्वाबों में ही सही मिलने की फरियाद करते हो..

5. तुम्हारी हंसी मेरी दुनिया को तो ना बदल पायेगी..
जब भी आयेंगे आंसू, मुझे तेरी याद जरूर आएगी....

6. "बलदेव" तेरी चाहत ने तुझे यूँ भी रुलाया है,
बनाकर तुझे अपना, दरियाओं में डुबाया है..
जो न कभी बनती तस्वीर उसकी लकीर हूँ मैं.
मैंने ठोकर खाकर भी पत्थरों से दिल लगाया है...

7. इक फासला था जो मिट न पाया और हम चल दिए,
वो रोये भी गर बाद में तो ये आंसू मेरे किस काम के...

8. तेरे पहलू से जो छिटक कर है गिरा,
वो कुछ और नहीं, मेरे दिल का टुकड़ा था :-((

9. ये क्यों बेवजह मुझको तडपाने की ज़हमत उठाते हो...
ज़रा इंतज़ार करो, मैं खुद ही फनाह हो जाऊँगा..

बुधवार, नवंबर 02, 2011

तलाश......अजनबी ठिकाने की

मेरा नसीब
इक खोटा सिक्का,
तलाशता फिरता है
किसी अजनबी ठिकाने को..
न दरिया तैर पाया
न समंदर ही लांघ पाया,
ये गिरता पड़ता आज फिर
मुझ तक चला आया,
मेरा नसीब
इक मोहब्बत का मारा
मांगता फिरता है,
किसी अजनबी दीवाने को...
रात बाकी थी कभी
ना दिन का था उसको इंतज़ार,
सहराओं की बस्ती थी इक तरफ
दलदल दूजी ओर थी बेशुमार,
मेरा नसीब
इक बेसहारा सा दुलारा
देखता रहता है शायद
ख्वाबों में लहराते फ़साने को..
मेरा नसीब
इक खोटा सिक्का,
तलाशता फिरता है
किसी अजनबी ठिकाने को..

ये जो अश्को की थी बारिश
ये शायद उसका ही जूनून था,
ये जो लहू का था इक कतरा
शायद उसका ही इक मज़मून था,
टुकड़ों को सजाता फिरता था,
दिल के ज़ख्मों को भूल
गैरों से फिर दिल लगाने को....
पता जो कभी जिंदगी की शाम,
न आता इस तरफ हाथों में लिए जाम,
बंद कर दिए थे जिसने,
उन्ही दर वालों की ठोकर खाने को...
मेरा नसीब
इक खोटा सिक्का,
तलाशता फिरता है
किसी अजनबी ठिकाने को..

जिस्म को काटने की जिद थी
काट ही डाला मगर
औरों का नहीं बल्कि खुद को...
ले जाकर बेच डाला फिर उसे
गोश्तखोरों की तस्तरी में,
आग बना के अपने दिलजले की,
ताप लिया था खुद की बोटियों को..
ये हँसता था तो अच्छा लगता था नहीं,
अब रोता है तो सबका दिल लुभाने को....
मेरा नसीब
इक खोटा सिक्का,
तलाशता फिरता है
किसी अजनबी ठिकाने को..


~बलदेव~

शुक्रवार, अक्तूबर 14, 2011

Let me smile with your smiles

Let us not speak out in open,
Let it be a dream not yet broken,
Let the things turn positive,
Let the imaginations get sensitive,
Let the heart speak the truth,
Let the world not go as sleuth,
Let the voice be so generic,
Let the thoughts be specific,
Let us enjoy every heartbeat,
Let your heart accept n greet,
Let me smile with your smiles,
Let me throw your pain by miles ....
Ohh, I can feel the sensuousness of your charm,
be here and make me always warm....
thanks my dear soul mate....


~baldev~

रविवार, मई 15, 2011

नामो-निशान

बाजार में बिकता देखा है हमने हर सामान,
इसी में बिक गया मेरा छोटा सा मकान,
दर्द जो बांटने चला यारों का कभी,
दर्द में ही डूब के रह गयी मेरी ये दास्ताँ,
खिलती कलियों ने बिखेरी खुशबू मगर,
मेरे हाथों में रह गए काँटों से मिले निशान,
राहों में कोई अजनबी मिला अपना लिया,
आज अजनबी सी हो गयी मेरी ये पहचान,
क्यों मैं हसरत से देखता हूँ औरों की तरफ,
यहाँ नहीं दिखता कोई भी अब मेहरबान,
वो जिसकी खातिर कर ली सबसे दुश्मनी,
आज वोही बन गया मुझसे भी अनजान,
मुकद्दर आजमाने की तमन्ना की "बलदेव" ने,
मुकद्दर ने ही मिटा दिया मेरा भी नामो-निशान.....

नामो-निशान

बाजार में बिकता देखा है हमने हर सामान,
इसी में बिक गया मेरा छोटा सा मकान,
दर्द जो बांटने चला यारों का कभी,
दर्द में ही डूब के रह गयी मेरी ये दास्ताँ,
खिलती कलियों ने बिखेरी खुशबू मगर,
मेरे हाथों में रह गए काँटों से मिले निशान,
राहों में कोई अजनबी मिला अपना लिया,
आज अजनबी सी हो गयी मेरी ये पहचान,
क्यों मैं हसरत से देखता हूँ औरों की तरफ,
यहाँ नहीं दिखता कोई भी अब मेहरबान,
वो जिसकी खातिर कर ली सबसे दुश्मनी,
आज वोही बन गया मुझसे भी अनजान,
मुकद्दर आजमाने की तमन्ना की "बलदेव" ने,
मुकद्दर ने ही मिटा दिया मेरा भी नामो-निशान.....

शुक्रवार, मार्च 25, 2011

मुझको बस इक झरना न समझ,


खुशनसीब हैं जो झुका लेते हैं अपने काँधे पे सर,
हम तो हर एक के आगे दामन फैला के रोये,
आंसू बहाने तो बहुत चाहे पर कम निकले,
साँसों को सिसकियों में दबा दबा के रोये,
दिल ने जो कभी चाहा के हंस के उनका दीदार करूँ,
दिल को अपने हाथों ही चोट पहुंचा के रोये,
अब अगर कर भी लूं दीदार तो क्या फायदा,
दिल के टुकड़ों को तेरी चौखट पे सजा के रोये....

1. अपना दिल आज इक नुमाइश बन गया है,
दर्द की गहराइयों की पैमाइश बन गया है,
रहता हूँ हंसकर मगर आँखों में नमी है,
जी भरकर मुस्कुराना इक ख्वाइश बन गया है...

3. फ़ुरसत कहाँ मुझको के मुड़कर भी उस तरफ देखूं...
फ़ुरसत कहाँ मुझको... के... मुड़कर भी उस तरफ देखूं...
या रब मेरे महबूब को अब सामने तू ला दे.....
फ़ुरसत मुझको कहाँ के मुड़कर भी उस तरफ देखूं...
या रब मेरे महबूब को अब सामने तू ला दे.....
या तो मुझको उसके दीदार करा दे...
या तो ...मुझको .....उसके दीदार करा दे...
या फिर मेरी आँखों से ये नूर ही बुझा दे …

4.मुझको बस इक झरना न समझ,
समंदर भी मुझमे ही समाया है...
टूट कर बिखर जाते हैं जहां सभी सपने
हमने उन पत्थरों से दिल लगाया है...

शुक्रवार, मार्च 18, 2011

जब प्रीत बन गयी अनबुझ पहेरी

किसने देखा मीरा को,
किसने देखा राधा को,
कोई था जो हुआ करता था,
कोई था जो दिल को छुआ करता था,
कोई था....कोई था में क्यों हम रहें
कोई है से ही क्यों न सब कुछ कहें
उस जोगन को खुद से अलग कर लो,
इक नयी जोगन को खुद में भर लो,
प्यार को इक नया नाम दो,
लो आज ही उस प्यार को आगाज़ दो,
लो आज ही प्यार को बुला लो
लो आज ही प्यार से खुद को मिला लो...

श्याम इक बार राधा से जुदा जो हुआ,
फिर उसके बाद ना वो उसका हुआ..
क्यों राधा उस श्याम को ही याद करे
जो इक पल में ही उससे दूर हुआ...
राधा ने तो खुद को श्याम के संग जोड़ दिया
दुनिया को प्यार का इक नया नाम दिया
मगर फिर भी जुदाई तो थी नसीब में
के राधा तो फिर ना रही कभी भी करीब में...
के राधा तो फिर ना रही कभी भी करीब में...

लेकर अंखियों में चाहत
हम हर रोज़ फिरा करते हैं,
जब दरश की हो प्यासी अँखियाँ
उनमे बस नीर ही भरा करते हैं,
इत बैठूं, उत जाऊं,
कहीं भी मनवा ये चैन ना पाऊं,
काहे मैं पाती का कागद फैराऊं,
मैं काहे कलम हाथ में घुमाऊं..
जब प्रीत बन गयी अनबुझ पहेरी
फिर काहे का ऊधव,
फिर काहे की कोई सहेरी...

गुरुवार, मार्च 17, 2011

होली की फुलझरियां बलदेव के साथ...

१. किसी ने मंत्री जी से पूछा के मंत्री जी,
विरोधी पार्टी में रहकर जो समस्याएँ नज़र आती हैं,
सत्ता में आते ही वो सब कहाँ चली जाती हैं....
मंत्री जी बोले समस्याओं से हमने कब इनकार किया,
समस्याओं की खातिर ही तो हमने अवतार लिया..
समस्या इतनी गंभीर है के पांच साल हम उसपर करेंगे विचार,
और पांच साल बाद फिर से सत्ता में आये तो करेंगे उस पर कार्य...

२. घर की चौखट पे बैठी भौजाई को सूझी ठिठोली,
और लगी देवर से खेलने रंगों और व्यंगों की होली..
बोली की तुम पर भी तो हमारा आधा अधिकार,
क्यों नहीं लुटाते हम पर भी थोडा सा प्यार...
सुनकर देवर को भी मस्ती सुझाई,
और फिर उसने भी व्यंग की छड़ी घुमाई..
बोले हम तो आधा नहीं पूरा ही दे देते प्यार,
मगर भैया के हाथों से नहीं छूटती तुम्हारी पतवार..
तुम उन संग ही प्रीत की रीत निभाओ,
मुफ्त में अपनी देवरानी के हाथों तो हमें ना पिटवाओ...

३. काले गोरे का भेद नहीं हर दिल से हमारा नाता है,
मिया ये होली के रंग का है असर,
एक बार रंग निकला नहीं के 'सब कुछ नज़र आता है"....

४. "एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया"...क्यों नहीं, क्यों नहीं, सरकार बचाने के लिए एम पी को दस करोड़ जो मिले थे .....

मंगलवार, मार्च 15, 2011

आज फिर से कोई अपना सा लगने लगा मुझे

प्यार को कभी भी सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता और जो सीमाओं में बंधा हो वो प्यार नहीं होता. यदि हम सिर्फ अपने सगे सम्बन्धियों से प्यार करते हैं तो ये प्यार नहीं. प्यार असीमित होता है, प्यार का ज़ज्बा कभी भी दुश्मनी या नफरत नहीं सिखाएगा. प्यार हमें प्रत्येक के करीब लाता है और फिर ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दर्शाता है. हमारा एक या कुछ एक के प्रति प्यार और दूसरों के प्रति द्वेष सदैव दुःख और पीड़ा की और लेकर जाता है...
प्यार में जो भावना हो वो कुछ इस कदर हो के इंसान कहे...

"आज फिर से इक चेहरा तस्सवुर में दिखा ,
आज फिर से कोई अपना सा लगने लगा मुझे"

प्यार अगर दिल में हो तो इंसान अगर भगवान् ना भी बन सके मगर इंसान कहलाने के लायक तो हो ही सकता है...प्यार वो नहीं के जिसमे हम कहें के हमें दूसरों से प्यार है.. प्यार वो है के जिसमे दूसरे कहें के उन्हें हमसे प्यार है....

"प्यार को शब्दों में बाँध पाए वो जिगर कहाँ से लाऊं,
और जिनमे प्यार के सिवा कुछ न हो वो नज़र कहाँ से लाऊं"

हम बस यही सोचते रह जाते हैं... जबकि प्यार को किसी भी अलग तरह की नज़र की जरूरत नहीं..हम खुद को प्यार में डुबो लें और उसके बाद नज़रें घुमाये तो हर तरफ प्यार ही प्यार नज़र आने लगेगा..

रविवार, मार्च 13, 2011

किस्सों को सुनाने से भी क्या हासिल बता ऐ जिंदगी...

जिंदगी देने वाले ने ही जब हिस्सों में बाँट दी हो जिंदगी
फिर किस्सों को सुनाने से भी क्या हासिल बता ऐ जिंदगी...


यूँ ही फ़ैल गयी हवाओं में तेरी पायल की खनखनाहट,
के हर पत्ता अब बस तेरी आवाज़ सुनाये जाता है...


गम के कतरों पे जीने वाले लम्बी उम्र मांग के लाते हैं,
हंसी को साथ रखने वाले तो यूँ भी जल्द चले जाते हैं,
किसने साथ दिया जिंदगी भर "बलदेव" इक गम के सिवा,
यादों और वादों पे जीने वाले तो अक्सर ही धोखा खाते हैं...


शिकस्त थी ही नहीं मगर दे दी गयी है,
ऐ जीतने वाले मेरी किस्मत तुझे दे दी गयी है..
लबों पे सिर्फ अफसाना और चंद फरियादें हैं,
मेरे दुश्मनों को मेरी शोहरत भी दे दी गयी है..


जिंदगी को सफ़ेद चादर बना 
ओड कर बैठ गए थे इक कोने में,
जिंदगी ने समझ लिया के अब शायद..
वक़्त आ गया अब इस चादर में सिमटने का..

शनिवार, मार्च 12, 2011

मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा

महकता था जो आँचल कभी
आज थोडा सा वो फट गया है,
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....
दूर किसी पेशानी पे अब भी
इक लकीर करवट बदल रही है...
दूर किसी काँधे पे अब भी
गम की बस्ती मचल रही है...
तेरे खुश्क होते होंठो पे बिखरा
कोई कतरा छटक गया है...
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....
कलाई से लेकर बाहों तक का सफ़र
यूँही नहीं आसान जितना के लग रहा है..
दिल तक पहुँचने वाला ये सौदा..
हर ज़ज्बे को चीर कर भी बढ रहा है...
फलक पे टिका के नज़रें
ये दिल तेरी पलकों पे अटक गया है..
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

खनक रहा था, महक रहा था

खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
खुशियाँ गीत सुनाती,
मुस्कान फूल बिखराती,
माथे पे बिंदिया दिल को चुरा ले जाती...
फिर ना जाने क्या था जो गम भर गया..
उसको मुझसे मुझको उससे जुदा कर गया..
खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
ये बात अब पुरानी हो गयी...
जिंदगी "बलदेव" संग अब वीरानी हो गयी...
.

खनक रहा था, महक रहा था

खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
खुशियाँ गीत सुनाती,
मुस्कान फूल बिखराती,
माथे पे बिंदिया दिल को चुरा ले जाती...
फिर ना जाने क्या था जो गम भर गया..
उसको मुझसे मुझको उससे जुदा कर गया..
खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
ये बात अब पुरानी हो गयी...
जिंदगी "बलदेव" संग अब वीरानी हो गयी...
.

सोमवार, फ़रवरी 21, 2011

नादाँ है दिल


आवाजें कई जो मुझको
है हरदम सुनायी देती,
फिर ज़र्रे को क्यों शिकायत
सुनसान हो गया है ||

इक शहर था के जिसको
आबाद कर चला था,
लौट के आया तो देखा
वीरान हो गया है ||

खुशियाँ थी चंद अपनी
गैरों तक में हमने बाटी,
फिर अपनों ने क्यों कोसा
नादान हो गया है ||

इस घर का एक कोना
जो लगता था मुझको अपना,
उनकी नज़र में वो तो 
शमशान हो गया है ||

प्यार को उसने कभी भी
मुझपर नहीं लुटाया,
आज देकर वो दर्द मुझको
मेहरबान हो गया है ||

दिल जिनके हाथों था टूटा
आज फिर से मचल रहा है,
खुशहाल देखकर के उनको
कद्रदान हो गया है ||

~बलदेव~

जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें


जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,
हँसते हैं तो रुलाती हैं हमें,
रोते हैं तो मिटाती है हमें....
जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,

यादों के झरोखों से बुलाती है हमें,
बुलाकर फिर भुलाती है हमें,
आंसुओं के सैलाब में डुबाती है हमें,
फिर भी ना जाने क्यों भाती है हमें,
जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,

तैरना ना आये तो पानी से डराती है हमें,
तैरना अगर आ जाये तो भंवर में डुबाती है हमें,
नदिया के कोनो से फिसलाती है हमें,
कांटो भरी राह पे नंगे पैर दौडाती है हमें,
जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,

रविवार, जनवरी 23, 2011

कुछ लम्हे तन्हाई के...


हमने महबूब को खुदा और प्यार को इबादत समझा,
फिर भी जाने क्यों लोग मुझे काफिर कहने लगे...

यूँ ही नहीं था मुन्तजिर उसकी आहट का मैं...
अकेला चल नहीं पाया इसलिए बैठ गया था मैं...

न समझ पाया जिसे आज तक कोई
उसी का नाम जिंदगी है,
किताब के पन्नो पे गुमनाम स्याही से
लिखी गयी इबारत ही जिंदगी है....
इसकी उधेड़ बुन न शुरू होती
और ना ही ख़त्म होती....
जो टूट कर फिर से ना बन पाए
उसी का नाम जिंदगी है...

मुझे किसी किताब की कोई जरूरत नहीं,
इक पन्ना दे दो उसी में समा जाऊँगा मैं....

आज इक रेत की चादर को मेरे ऊपर डाल दो,
आज "बलदेव" फिर पानी का बुलबुला हो गया है..

नज़रों का था धोखा और दिल के हाथों मजबूर,
शायद किस्मत को ठोकर खाना था मंज़ूर...

मुझको तस्सल्ली ना देना, बहुत दिन तडपा हूँ मैं,
इक आग के नजदीक आकर, पानी को तरसा हूँ मैं..

नहीं मालुम था के गुलाब भी, इक दिन रुलाएगा
देकर ज़ख्म ये सुन्दर फूल, यूँ मेरा खून बहायेगा..

मुझको बस इक झरना न समझ,
समंदर भी मुझमे ही समाया है...
टूट कर बिखर जाते हैं जहां सभी सपने
हमने उन पत्थरों से दिल लगाया है...

मैं बहाता हूँ खून, फिर क्यों लोग पानी कहते हैं...
मेरी बदनामियों को मेरी ही तकदीर समझ लेते हैं..

'कुछ' है जो मुझको थामे बैठा था,
वरना 'कुछ' देर पहले ही वो चले गए,
अपने संग सब 'कुछ' लेकर,
हम 'कुछ' न पाकर बस खली रह गए..

मैं रोता तो हूँ मगर आंसू फिर भी नहीं निकलते,
इस दरिया को पार करना सबके बस की बात नहीं..

रात का स्पर्श था शायद बहुत प्यारा
इसलिए दिन होने का इंतज़ार न रहा..