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शनिवार, मार्च 12, 2011

मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा

महकता था जो आँचल कभी
आज थोडा सा वो फट गया है,
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....
दूर किसी पेशानी पे अब भी
इक लकीर करवट बदल रही है...
दूर किसी काँधे पे अब भी
गम की बस्ती मचल रही है...
तेरे खुश्क होते होंठो पे बिखरा
कोई कतरा छटक गया है...
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....
कलाई से लेकर बाहों तक का सफ़र
यूँही नहीं आसान जितना के लग रहा है..
दिल तक पहुँचने वाला ये सौदा..
हर ज़ज्बे को चीर कर भी बढ रहा है...
फलक पे टिका के नज़रें
ये दिल तेरी पलकों पे अटक गया है..
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....

2 टिप्‍पणियां:

  1. फलक पे टिका के नज़रें
    ये दिल तेरी पलकों पे अटक गया है..
    मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
    थक कर इक कोने में सिमट गया है....

    Beautiful creation !

    .

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया Zeal , आपने अपना कीमती समय इस रचना के लिए दिया, आशा करता हूँ के आगे भी मैं आप लोगों की कसौटी पे यूँ ही खरा उतरूं.. एक बार फिर से धन्यवाद.

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