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रविवार, मार्च 13, 2011

किस्सों को सुनाने से भी क्या हासिल बता ऐ जिंदगी...

जिंदगी देने वाले ने ही जब हिस्सों में बाँट दी हो जिंदगी
फिर किस्सों को सुनाने से भी क्या हासिल बता ऐ जिंदगी...


यूँ ही फ़ैल गयी हवाओं में तेरी पायल की खनखनाहट,
के हर पत्ता अब बस तेरी आवाज़ सुनाये जाता है...


गम के कतरों पे जीने वाले लम्बी उम्र मांग के लाते हैं,
हंसी को साथ रखने वाले तो यूँ भी जल्द चले जाते हैं,
किसने साथ दिया जिंदगी भर "बलदेव" इक गम के सिवा,
यादों और वादों पे जीने वाले तो अक्सर ही धोखा खाते हैं...


शिकस्त थी ही नहीं मगर दे दी गयी है,
ऐ जीतने वाले मेरी किस्मत तुझे दे दी गयी है..
लबों पे सिर्फ अफसाना और चंद फरियादें हैं,
मेरे दुश्मनों को मेरी शोहरत भी दे दी गयी है..


जिंदगी को सफ़ेद चादर बना 
ओड कर बैठ गए थे इक कोने में,
जिंदगी ने समझ लिया के अब शायद..
वक़्त आ गया अब इस चादर में सिमटने का..

शनिवार, मार्च 12, 2011

मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा

महकता था जो आँचल कभी
आज थोडा सा वो फट गया है,
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....
दूर किसी पेशानी पे अब भी
इक लकीर करवट बदल रही है...
दूर किसी काँधे पे अब भी
गम की बस्ती मचल रही है...
तेरे खुश्क होते होंठो पे बिखरा
कोई कतरा छटक गया है...
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....
कलाई से लेकर बाहों तक का सफ़र
यूँही नहीं आसान जितना के लग रहा है..
दिल तक पहुँचने वाला ये सौदा..
हर ज़ज्बे को चीर कर भी बढ रहा है...
फलक पे टिका के नज़रें
ये दिल तेरी पलकों पे अटक गया है..
मेरे अन्दर सिसकता इक जर्रा
थक कर इक कोने में सिमट गया है....

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

खनक रहा था, महक रहा था

खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
खुशियाँ गीत सुनाती,
मुस्कान फूल बिखराती,
माथे पे बिंदिया दिल को चुरा ले जाती...
फिर ना जाने क्या था जो गम भर गया..
उसको मुझसे मुझको उससे जुदा कर गया..
खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
ये बात अब पुरानी हो गयी...
जिंदगी "बलदेव" संग अब वीरानी हो गयी...
.

खनक रहा था, महक रहा था

खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
खुशियाँ गीत सुनाती,
मुस्कान फूल बिखराती,
माथे पे बिंदिया दिल को चुरा ले जाती...
फिर ना जाने क्या था जो गम भर गया..
उसको मुझसे मुझको उससे जुदा कर गया..
खनक रहा था, महक रहा था ...
जीवन उन संग चहक रहा था..
ये बात अब पुरानी हो गयी...
जिंदगी "बलदेव" संग अब वीरानी हो गयी...
.

सोमवार, फ़रवरी 21, 2011

नादाँ है दिल


आवाजें कई जो मुझको
है हरदम सुनायी देती,
फिर ज़र्रे को क्यों शिकायत
सुनसान हो गया है ||

इक शहर था के जिसको
आबाद कर चला था,
लौट के आया तो देखा
वीरान हो गया है ||

खुशियाँ थी चंद अपनी
गैरों तक में हमने बाटी,
फिर अपनों ने क्यों कोसा
नादान हो गया है ||

इस घर का एक कोना
जो लगता था मुझको अपना,
उनकी नज़र में वो तो 
शमशान हो गया है ||

प्यार को उसने कभी भी
मुझपर नहीं लुटाया,
आज देकर वो दर्द मुझको
मेहरबान हो गया है ||

दिल जिनके हाथों था टूटा
आज फिर से मचल रहा है,
खुशहाल देखकर के उनको
कद्रदान हो गया है ||

~बलदेव~

जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें


जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,
हँसते हैं तो रुलाती हैं हमें,
रोते हैं तो मिटाती है हमें....
जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,

यादों के झरोखों से बुलाती है हमें,
बुलाकर फिर भुलाती है हमें,
आंसुओं के सैलाब में डुबाती है हमें,
फिर भी ना जाने क्यों भाती है हमें,
जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,

तैरना ना आये तो पानी से डराती है हमें,
तैरना अगर आ जाये तो भंवर में डुबाती है हमें,
नदिया के कोनो से फिसलाती है हमें,
कांटो भरी राह पे नंगे पैर दौडाती है हमें,
जिंदगी ना जाने क्यों सताती है हमें,

रविवार, जनवरी 23, 2011

कुछ लम्हे तन्हाई के...


हमने महबूब को खुदा और प्यार को इबादत समझा,
फिर भी जाने क्यों लोग मुझे काफिर कहने लगे...

यूँ ही नहीं था मुन्तजिर उसकी आहट का मैं...
अकेला चल नहीं पाया इसलिए बैठ गया था मैं...

न समझ पाया जिसे आज तक कोई
उसी का नाम जिंदगी है,
किताब के पन्नो पे गुमनाम स्याही से
लिखी गयी इबारत ही जिंदगी है....
इसकी उधेड़ बुन न शुरू होती
और ना ही ख़त्म होती....
जो टूट कर फिर से ना बन पाए
उसी का नाम जिंदगी है...

मुझे किसी किताब की कोई जरूरत नहीं,
इक पन्ना दे दो उसी में समा जाऊँगा मैं....

आज इक रेत की चादर को मेरे ऊपर डाल दो,
आज "बलदेव" फिर पानी का बुलबुला हो गया है..

नज़रों का था धोखा और दिल के हाथों मजबूर,
शायद किस्मत को ठोकर खाना था मंज़ूर...

मुझको तस्सल्ली ना देना, बहुत दिन तडपा हूँ मैं,
इक आग के नजदीक आकर, पानी को तरसा हूँ मैं..

नहीं मालुम था के गुलाब भी, इक दिन रुलाएगा
देकर ज़ख्म ये सुन्दर फूल, यूँ मेरा खून बहायेगा..

मुझको बस इक झरना न समझ,
समंदर भी मुझमे ही समाया है...
टूट कर बिखर जाते हैं जहां सभी सपने
हमने उन पत्थरों से दिल लगाया है...

मैं बहाता हूँ खून, फिर क्यों लोग पानी कहते हैं...
मेरी बदनामियों को मेरी ही तकदीर समझ लेते हैं..

'कुछ' है जो मुझको थामे बैठा था,
वरना 'कुछ' देर पहले ही वो चले गए,
अपने संग सब 'कुछ' लेकर,
हम 'कुछ' न पाकर बस खली रह गए..

मैं रोता तो हूँ मगर आंसू फिर भी नहीं निकलते,
इस दरिया को पार करना सबके बस की बात नहीं..

रात का स्पर्श था शायद बहुत प्यारा
इसलिए दिन होने का इंतज़ार न रहा..